मंदिर स्थापना समारोह में हरिद्वार पहुंचे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि इस सांस्कृतिक राष्ट्र का निर्माण तलवार और सत्ता से नहीं बल्कि ऋषियों की कुटिया से हुआ है। उन्होंने मां गंगा को नमन करते हुए कहा कि साधु संतों की तपस्या और करोड़ों लोगों की आस्था यह बताने के लिए पर्याप्त है कि हरिद्वार सांस्कृतिक राष्ट्र के निर्माण की भूमि है।
उन्होंने कहा कि देश के रक्षा मंत्री के रूप में उन्हें यह कहने में गर्व है कि सीमाओं, सेनाओं और राष्ट्र की सुरक्षा सरकार कर रही है, लेकिन राष्ट्र की सांस्कृतिक सीमाओंं की रक्षा संत कर रहे हैं। इतिहास गवाह है जिन राष्ट्रों ने अपने सांस्कृतिक तंत्र को कमजोर किया उनका विघटन हुआ है।
रक्षा मंत्री ने कहा कि वसुधैव कुटुंबकम, गुरु शिष्य और ज्ञान परंपरा के साथ इन्हीं ऋषियों ने योग और आयुर्वेद भी दिया है। आज अदृश्य युद्ध जैसी स्थिति है। आज संस्कृति पर चौतरफा हमला हाे रहा है। जिससे भौगोलिक सीमाओं के साथ ही राष्ट्र की सांस्कृतिक सुरक्षा भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि भले ही आज हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, किंतु उनकी साधना, विचार और जीवन दर्शन आज भी समाज को मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं। प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा उनके जीवन मूल्यों और विचारधारा को पुनः जागृत करने का प्रतीक है।
रक्षा मंत्री ने कहा कि हरिद्वार केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र है। यहीं से भारतीय संस्कृति की अखंड धारा प्रवाहित होती है। संस्कृति कमजोर होती है तो राष्ट्र भी कमजोर हो जाता है। उन्होंने सनातन संस्कृति, अद्वैत वेदांत, भक्ति परंपरा और गुरु-शिष्य संवाद को भारत की आत्मा बताया।
उन्होंने कहा कि आधुनिकता और संस्कृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। तकनीकी ज्ञान के साथ संस्कार जुड़ जाएं तो राष्ट्र को कोई भी कमजोर नहीं कर सकता। उन्होंने युवाओं से राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान करते हुए देश की अखंडता, संप्रभुता और गौरव की रक्षा के लिए सामूहिक संकल्प लेने का संदेश दिया।




