ऐतिहासिक विश्व विद्यालय में दिव्य आध्यात्मिक यात्रा पर भारत से कथाकारों और साहित्य,विचार जगत के विद्वानों को भी ले जाया गया।।
आज राष्ट्र और विश्व को साधु भाषा की जरूरत है:बापू
लौकिक,अलौकिक छोड़कर मौलिक हो जाएगा तो बहुत अच्छा रहेगा।।
मेरा कोई मिशन नहीं लेकिन मीठा मनोरथ है कि हृदय विचारक बने और बुद्धि गुणातित हो जाए।।
शब्द कृत्य ना बने तब तक बात नहीं बनती,यह सेवनीय शास्त्र है।।
अपने तिरस्कार को पकड़ के रखे वो ग्रंथि और इनके स्वीकार की ओर ले जाये वो है-सदग्रंथ।
जब १५ अगस्त शनिवार की शाम सेन्डर्स थियेटर मेमोरियल हॉल-हार्वर्ड युनिवर्सिटी-अमेरिका से ९८२ वीं रामकथा की चौपाइयां गूंजी, अमेरिका की धरती पर भारत के ८० वें स्वतंत्रता दिवस पर एक विशेष संयोग हुआ,मोरारी बापू की रामकथा की आध्यात्मिक यात्रा का एक अविस्मरणीय पड़ाव आया।
मोरारी बापू की ये ४० वीं कथा अमेरिकी धरती पर होने जा रही है।।
ये रामकथा और आध्यात्मिक यात्रा कई प्रकार से विशिष्ट है।।
तुलसी जन्मोत्सव के अवसर पर बापू द्वारा अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय में कथागान हो रहा है।।
यह उल्लेखनीय है कि बापू इससे पहले ३९ बार अमेंरिकी धरती पर कथा सुना चुके हैं।।
इस प्रकार, तलगाजरडी व्यासपीठ अमेरिका में ४० वीं बार कथा उत्सव मना रहा है।।
इस बार की रामकथा की विशेषता यह है कि पूज्य बापू अमेरिका में तुलसी जन्मोत्सव मनाएंगे।।
कथा के दरमियान श्रावण सुद की ७,१९ तारीख को तुलसी जयंती का दिव्य महोत्सव पहली बार विदेश की भूमि पर होने जा रहा है।।
ये दिव्य अवसर पर बापू भारत से पचास कथाकारों को अमेरिका ले गए हैं।।
साथ ही गुजराती भाषा के विद्वान जनो,सर्जकों,कविओं,लेखकों,कलाकारों और अपने क्षेत्र के विशिष्ट महानुभावों की भी गरिमापूर्ण उपस्थिति है।।
यहां यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि पूज्य बापू ने २०१० में तुलसी जन्मोत्सव का सार्वजनिक आयोजन शुरू किया था।कलि पावनावतार पूज्य तुलसीदासजी महाराज की स्मृति में,तुलसी की जयंती के अवसर पर,महुवा स्थित कैलाश गुरुकुल ने भारत के विभिन्न भागों से रामकथा गायकों, कथावाचकों,रामचरितमानस विचारकों और रामकथा में योगदान देने वाले संस्थानों में से एक का चयन करके उन्हें तुलसी पुरस्कार से सम्मानित करने की पहल शुरू की।।
इसके बाद, तुलसी पुरस्कार के साथ-साथ व्यास पुरस्कार और वाल्मीकि पुरस्कार भी इस पहल में शामिल किए गए।।
यह कार्यक्रम २०१० से २०२४ तक गुरुकुल में प्रतिवर्ष आयोजित किया गया।।
पिछले वर्ष यह कार्यक्रम तुलसीदासजी की जन्मभूमि राजापुर में आयोजित किया गया था।
इस वर्ष पहली बार विदेश की धरती-अमेरिका में यह आयोजित किया गया है।।
बापू के लिए रामचरितमानस स्वयं सद्गुरु है।।
यह भगवान राम का वान्ग्मयी रूप है।।हर साल, तुलसीदासजी की पवित्र स्मृति में,उनके रचयिता के लिए,ज्ञानवान कथाकार और विचारक रामचरितमानस और रामायण पर विशेष चिंतन के लिए अपने नए विचार प्रस्तुत करते हैं।।
पूज्य बापू एक श्रोता के रूप में,विनम्रता और एकाग्रता के साथ रामायण पर नए विचारों को सुनते हैं।राम कथा के साथ-साथ,श्रोताओं को संध्या सभा में ज्ञानवान वक्ताओं के व्याख्यान सुनने का भी लाभ मिलेगा।।
यह एक सुंदर संयोग है कि यह कथा १५ अगस्त – भारत के ८० वें स्वतंत्रता दिवस -को शुरू हो रही है।
आज कथा के आरंभ में खचाखच भरे हुए हॉल में बिलकूल सादगीभरी दिव्यतामयी वातावरण में दीप प्रज्जव्लन एवं इस कथा के मनोरथी लोर्ड डोलर पोपट और परिवारजनों से स्वागत भाव के बाद मानस की चौपाइयां रुपी बीज पंक्तियों का गायन हुआ।।बापू ने पहले से इस रामकथा का विषय ‘मानस गुरु प्रसाद’ पर संवाद करना तय किया था।
गुर प्रसाद सब जानिअ राजा।
कहिअ न आपन जानि अकाजा।।
-बालकॉंड-१६४
मख रखवारि करि दुहुं भाइ।
गुरु प्रसाद सब बिद्या पाइ।।
-बालकॉंड-३५७
सहित समाज तुम्हार हमारा।
घर बन गुर प्रसाद रखवारा।।
-अयोध्या कॉंड-३०६
कथा के आरंभ में दीप प्रज्वलन और वैदिक घनपाठ के बाद यहां के मैनेजमेंट की तरफ से स्वागत भाव और लॉर्ड डॉलर पोपट ने भी अपने शब्दों में स्वागत किया।।
बापू ने जब बीज पंक्तियों के गान के बाद कथा का आरंभ किया।भारत से पधारे हुए संतो,कथावाचको हार्वर्ड का वह ऐतिहासिक सभागार और स्कॉलर्स की भव्य बैठक व्यवस्थाओं की बेंच पर श्रोताओं ने स्थान ग्रहण किया और विश्व विख्यात विन्टेज हेरिटेज जैसा सेंडलर’स हॉल,आज हार्वर्ड विश्वविद्यालय में हार्ड वर्क और हार्ट वर्क (बापू) का मिलन हुआ।।
बापू ने कहा कि परमात्मा की असीम कृपा से इस विश्वविद्यालय के आंगन में सावन मास में रामकथा का आरंभ हो रहा है।।यहां जो आ सके वह सभी पूज्य चरण और वीज़ा के कारण नहीं आ पाए वह पूज्य चरणों को प्रणाम करते हुए साहित्य,विचार जगत के मनीषियों यहां आए हैं।।आज राष्ट्र और विश्व को साधु भाषा की जरूरत है।।
पावन पोपट ने लॉर्ड डॉलर पोपट,संध्या बहन,रुपिन शिवांग-पूरे परिवार के सहयोग में गजब तो नहीं लेकिन अजब काम किया है।।यह हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हार्ड वर्क और हार्ट वर्क के कारण कर सका है।। यूनिवर्सिटी की ओर से एक सभ्य व्यवस्था के लिए तलगाजरडा आए थे।।आज आनंदपूर्ण,सद्भाव पूर्ण,आवकार और आदर दिया उसके प्रति बापू ने बहुत धन्यवाद प्रकट किया।।
बापू ने कहा यह होना ही था इसलिए हो रहा है! ब्रिटेन की लॉर्ड परंपरा में नियम था जिनके पिता लॉर्ड है उनका पुत्र भी लॉर्ड बन सकता है,अब तो यह नियम बंद हो गया लेकिन यह इतिहास नहीं आध्यात्मिक अनुष्ठान होने जा रहा है।।
यहां कथा के पहले सुबह गुजरात से आए सुभाष भट्ट,नेहल गढ़वी,जय बसावड़ा आदि ने सनातन मंदिर में एक प्रवचन किया वहीं शायद मंगलाचरण हो गया था।।
लौकिक,अलौकिक छोड़कर मौलिक हो जाएगा तो बहुत अच्छा रहेगा।।यह विश्वविद्यालय में संख्या में कितने गुरु हुए होंगे,कितने राजनेता,नॉबेल पुरस्कार विनर और उद्योगपति भी यहां पढे हैं।। रामचरितमानस में बिलग-बिलग प्रसाद के बारे में ३३ बार पंक्ति आई है।वहां तीन बार ‘गुरु प्रसाद’ शब्द आया है उन पर हम संवाद करेंगे।।
विश्व में आज संवाद की जरूरत है।मानस में ज्ञान, भक्ति,कर्म,उपासना के घाट पर संवाद हुए हैं।। यूनिवर्सिटी में रामकथा?स्वाभाविक प्रश्न उठता है। लेकिन साहित्य जगत इसे महाकाव्य कहते हैं तो यह यूनिवर्सिटी में होना चाहिए।।लेकिन गोस्वामी जी केवल महाकाव्य नहीं महामंत्र मानते हैं।।
ग्रंथ,ग्रंथि मुक्त है।ये ग्रंथ नहीं सदग्रंथ है।।इन में त्रिभुवनीय विचार है,वैश्विक विचार है।।हम पूजन करते हैं,सेवन नहीं करते।शब्द कृत्य ना बने तब तक बात नहीं बनती।यह सेवनीय शास्त्र है।।सत्य प्रेम और करुणा मानस की प्रस्थानत्रयि है।।अपने तिरस्कार को पकड़ के रखे वो ग्रंथि और इनके स्वीकार की ओर ले जाये वो है मानस जैसे सदग्रंथ।
यहां महात्म्य महिमागान तो है ही लेकिन ग्रंथ परिचय वक्ता करवाते हैं।।हमें ग्रंथियों का परिचय है पूर्व ग्रह की ग्रंथि,हीन ग्रंथि,लघुता ग्रंथी लेकर हम बैठे हैं।।
बौद्ध साहित्य में एक शब्द है-तिरस्यरक्षिता- तिरस्कार को रक्षण करने वाला।।सम्राट अशोक की पांच पत्नी थी। तीसरे नंबर की पत्नी का नाम पद्मावती था और पांचवीं का नाम तिरस्यरक्षिता थी।।भागवत में सात दिन में ग्रंथियां से मुक्त होने की बात है।।पद्मावती का बेटा कृणाल था।जिसकी आंखें बहुत सुंदर है उसे कृणाल कहते हैं और यह युवान था।।पांचवी माता बहुत सुंदर थी वह कृणाल के प्रति आकर्षित होने लगी और वह कहती थी कि बेटा तेरी आंखें बहुत सुंदर है।।राजा वशीभूत था कुणाल की आंखें फुडवा दी फिर वह रानी को भी मार दिया गया ऐसा कहते हैं।।तिरस्यरक्षिता जैसी वृत्ति मरनी ही चाहिए।।
कृणाल को भगवान बुद्ध के पास लिया ले जाया गया।।जैसे बारह मेघ की तरह गुरु भी १२ प्रकार की कृपा करते हैं।। बुद्ध ने अपनी करुणा भरी दृष्टि कृणाल पर की और कहते हैं कृणाल को दिखाई देने लगा।।
यहां सात सोपान,वाल्मीकि जिसे कांड कहते हैं और फिर पहले सोपान के सात मंत्र में पहला मंत्र वर्ण,अर्थ संघ,शब्द,वाक्य पद ये सब मंगल करने वाले वाणी और विनायक की वंदना करते हैं।।
पांच सोरठे लेकर तुलसी जी लोकबोली में आये ।पंचदेवों की पूजा की बात की।।जगदगुरु शंकराचार्य जी के विचारों को शामिल कर के सेतुबंध किया।।गणेश,सूर्य,विष्णु,शिव और पार्वती की वंदना हुई।।
पांचवे सोरठे में गुरुवंदना की।।गुरुपद कंज असंग चरणों को वंदन किया।।मैं तो गुरु प्रसाद पा कर चलने वाला हूं।।गुरु नर रुप हरि है ऐसे गुरु में पांचो देव है।। मेरा कोई मिशन नहीं लेकिन मीठा मनोरथ है कि हृदय विचारक बने और बुद्धि गुणातीत हो जाए।।गुरु वंदना के पहले प्रकरण जिसे बापू मानस गुरु गीता कहते हैं वह गुरु वंदना का गान हुआ।फिर सभी वंदनाओ में शुरु में ब्राह्मणो,साधु सज्जनो,खलों,शठो,असुरों सब की वंदना करके मानस के पात्रों में पहले मातृरुप कौशल्या आदि माताओं और पारिवारिक वंदना में हनुमान जी पारिवारिक भी है यहां हनुमंत वंदना का गान कर के आज की कथा को विराम दिया गया।।
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